॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.12.11
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मा भूतेन्द्रियाशयाः।
शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात्॥ ११
puruṣaḥ prakṛtirvyaktamātmā bhūtendriyāśayāḥ|
śaknuvantyasya sargādau na vinā yadanugrahāt|| 11
अर्थ
भगवान्के कृपा-प्रसादके बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-चतुष्टय—ये कोई भी इस विश्वकी उत्पत्ति आदि करनेमें समर्थ नहीं हो सकते॥ ११॥