श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.23

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत्-

पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र।

ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो

यो दुर्लभोऽकिञ्चनगोचरोऽन्यैः॥ २३

traivargikāyāsavighātamasmat-

patirvidhatte puruṣasya śakra|

tato'numeyo bhagavatprasādo

yo durlabho'kiñcanagocaro'nyaiḥ|| 23

अर्थ

इन्द्र! हमारे स्वामी अपने भक्तके अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी प्रयासको व्यर्थ कर दिया करते हैं और सच पूछो तो इसीसे भगवान्‌की कृपाका अनुमान होता है। क्योंकि उनका ऐसा कृपा-प्रसाद अकिंचन भक्तोंके लिये ही अनुभवगम्य है, दूसरोंके लिये तो अत्यन्त दुर्लभ ही है॥ २३॥✎ 529

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #529 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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