श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां

याः सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम्।

न राति यद् द्वेष उद्वेग आधि-

र्मदः कलिर्व्यसनं संप्रयासः॥ २२

puṃsāṃ kilaikāntadhiyāṃ svakānāṃ

yāḥ sampado divi bhūmau rasāyām|

na rāti yad dveṣa udvega ādhi-

rmadaḥ kalirvyasanaṃ saṃprayāsaḥ|| 22

अर्थ

जो पुरुष भगवान्‌से अनन्यप्रेम करते हैं—उनके निजजन हैं—उन्हें वे स्वर्ग, पृथ्वी अथवा रसातलकी सम्पत्तियाँ नहीं देते। क्योंकि उनसे परमानन्दकी उपलब्धि तो होती ही नहीं; उलटे द्वेष, उद्वेग, अभिमान, मानसिक पीड़ा, कलह, दुःख और परिश्रम ही हाथ लगते हैं॥ २२॥✎ 527 528

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #527 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #528 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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