श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथो हरे मे कुलिशेन वीर

हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह।

तत्रानृणो भूतबलिं विधाय

मनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये॥ १८

atho hare me kuliśena vīra

hartā pramathyaiva śiro yadīha|

tatrānṛṇo bhūtabaliṃ vidhāya

manasvināṃ pādarajaḥ prapatsye|| 18

अर्थ

वीर इन्द्र! यह भी सम्भव है कि तू मेरी सेनाको छिन्‍न-भिन्‍न करके अपने वज्रसे मेरा सिर काट ले। तब तो मैं अपने शरीरकी बलि पशु-पक्षियोंको समर्पित करके, कर्म-बन्धनसे मुक्त हो महापुरुषोंकी चरणरजका आश्रय ग्रहण करूँगा—जिस लोकमें महापुरुष जाते हैं, वहाँ पहुँच जाऊँगा॥ १८॥✎ 527 528

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #527 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #528 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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