श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.3

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम्।

संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापहः॥ ३

api vṛndārakā yūyaṃ na jānītha śarīriṇām|

saṃsthāyāṃ yastvabhidroho duḥsahaścetanāpahaḥ|| 3

अर्थ

‘देवताओ! आपलोगोंको सम्भवतः यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियोंको बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जबतक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्तमें वे मूर्च्छित हो जाते हैं॥ ३॥

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