देवताओंद्वारा दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे वज्र-निर्माण और वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण
श्रीशुक उवाच
इन्द्रमेवं समादिश्य भगवान् विश्वभावनः।
पश्यतामनिमेषाणां तत्रैवान्तर्दधे हरिः॥ १
indramevaṃ samādiśya bhagavān viśvabhāvanaḥ|
paśyatāmanimeṣāṇāṃ tatraivāntardadhe hariḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्वके जीवनदाता श्रीहरि इन्द्रको इस प्रकार आदेश देकर देवताओंके सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १॥
इन्द्रमेवं समादिश्य भगवान् विश्वभावनः।
पश्यतामनिमेषाणां तत्रैवान्तर्दधे हरिः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्वके जीवनदाता श्रीहरि इन्द्रको इस प्रकार आदेश देकर देवताओंके सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.10.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 753) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/10/1/