श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्मात्पुरैवाश्विह पापनिष्कृतौ

यतेत मृत्योरविपद्यताऽऽत्मना।

दोषस्य दृष्ट्वा गुरुलाघवं यथा

भिषक् चिकित्सेत रुजां निदानवित्॥ ८

tasmātpuraivāśviha pāpaniṣkṛtau

yateta mṛtyoravipadyatā''tmanā|

doṣasya dṛṣṭvā gurulāghavaṃ yathā

bhiṣak cikitseta rujāṃ nidānavit|| 8

अर्थ

इसलिये बड़ी सावधानी और सजगताके साथ रोग एवं मृत्युके पहले ही शीघ्र-से-शीघ्र पापोंकी गुरुता और लघुतापर विचार करके उनका प्रायश्चित्त कर डालना चाहिये, जैसे मर्मज्ञ चिकित्सक रोगोंका कारण और उनकी गुरुता-लघुता जानकर झटपट उनकी चिकित्सा कर डालता है॥ ८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें