श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.7

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

न चेदिहैवापचितिं यथांहसः

कृतस्य कुर्यान्मनउक्तिपाणिभिः।

ध्रुवं स वै प्रेत्य नरकानुपैति

ये कीर्तिता मे भवतस्तिग्मयातनाः॥ ७

na cedihaivāpacitiṃ yathāṃhasaḥ

kṛtasya kuryānmanaüktipāṇibhiḥ|

dhruvaṃ sa vai pretya narakānupaiti

ye kīrtitā me bhavatastigmayātanāḥ|| 7

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—मनुष्य मन, वाणी और शरीरसे पाप करता है। यदि वह उन पापोंका इसी जन्ममें प्रायश्चित्त न कर ले, तो मरनेके बाद उसे अवश्य ही उन भयंकर यातनापूर्ण नरकोंमें जाना पड़ता है, जिनका वर्णन मैंने तुम्हें (पाँचवें स्कन्धके अन्तमें) सुनाया है॥ ७॥

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