श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.67

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यदसौ शास्त्रमुल्लङ्‌घ्य स्वैरचार्यार्यगर्हितः।

अवर्तत चिरं कालमघायुरशुचिर्मलात्॥ ६७

yadasau śāstramullaṅghya svairacāryāryagarhitaḥ|

avartata ciraṃ kālamaghāyuraśucirmalāt|| 67

अर्थ

इस पापीने शास्त्राज्ञाका उल्लंघन करके स्वच्छन्द आचरण किया है। यह सत्पुरुषोंके द्वारा निन्दित है। इसने बहुत दिनोंतक वेश्याके मल-समान अपवित्र अन्‍नसे अपना जीवन व्यतीत किया है, इसका सारा जीवन ही पापमय है॥ ६७॥

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