यह कुबुद्धि न्यायसे, अन्यायसे जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहींसे उठा लाता। उस वेश्याके बड़े कुटुम्बका पालन करनेमें ही यह व्यस्त रहता॥ ६६॥
यतस्ततश्चोपनिन्ये न्यायतोऽन्यायतो धनम्।
बभारास्याः कुटुम्बिन्याः कुटुम्बं मन्दधीरयम्॥ ६६
यह कुबुद्धि न्यायसे, अन्यायसे जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहींसे उठा लाता। उस वेश्याके बड़े कुटुम्बका पालन करनेमें ही यह व्यस्त रहता॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 702) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/66/