श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.63

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तन्‍निमित्तस्मरव्याजग्रहग्रस्तो विचेतनः।

तामेव मनसा ध्यायन् स्वधर्माद्विरराम ह॥ ६३

tannimittasmaravyājagrahagrasto vicetanaḥ|

tāmeva manasā dhyāyan svadharmādvirarāma ha|| 63

अर्थ

उस वेश्याको निमित्त बनाकर काम-पिशाचने अजामिलके मनको ग्रस लिया। इसकी सदाचार और शास्त्रसम्बन्धी चेतना नष्ट हो गयी। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्याका चिन्तन करने लगा और अपने धर्मसे विमुख हो गया॥ ६३॥

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