यद्यपि अजामिलने अपने धैर्य और ज्ञानके अनुसार अपने कामवेगसे विचलित मनको रोकनेकी बहुत-बहुत चेष्टाएँ कीं, परन्तु पूरी शक्ति लगा देनेपर भी वह अपने मनको रोकनेमें असमर्थ रहा॥ ६२॥
स्तम्भयन्नात्मनाऽऽत्मानं यावत्सत्त्वं यथाश्रुतम्।
न शशाक समाधातुं मनो मदनवेपितम्॥ ६२
यद्यपि अजामिलने अपने धैर्य और ज्ञानके अनुसार अपने कामवेगसे विचलित मनको रोकनेकी बहुत-बहुत चेष्टाएँ कीं, परन्तु पूरी शक्ति लगा देनेपर भी वह अपने मनको रोकनेमें असमर्थ रहा॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 702) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/62/