श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.56

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अयं हि श्रुतसम्पन्‍नः शीलवृत्तगुणालयः।

धृतव्रतो मृदुर्दान्तः सत्यवान्मन्त्रविच्छुचिः॥ ५६

ayaṃ hi śrutasampannaḥ śīlavṛttaguṇālayaḥ|

dhṛtavrato mṛdurdāntaḥ satyavānmantravicchuciḥ|| 56

अर्थ

देवताओ! आप जानते ही हैं कि यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद‍्गुणोंका तो यह खजाना ही था। व्रतधारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था॥ ५६॥✎ 1360 1361

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1360 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्मचारी, → ब्रतधारी,
  • #1361 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रतधारी, → व्रतधारी,

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