आपने यह भी बतलाया कि अधर्म करनेसे अनेक नरकोंकी प्राप्ति होती है और (पाँचवें स्कन्धमें) उनका विस्तारसे वर्णन भी किया। (चौथे स्कन्धमें) आपने उस प्रथम मन्वन्तरका वर्णन किया, जिसके अधिपति स्वायम्भुव मनु थे॥ ३॥
अधर्मलक्षणा नाना नरकाश्चानुवर्णिताः।
मन्वन्तरश्च व्याख्यात आद्यः स्वायम्भुवो यतः॥ ३
आपने यह भी बतलाया कि अधर्म करनेसे अनेक नरकोंकी प्राप्ति होती है और (पाँचवें स्कन्धमें) उनका विस्तारसे वर्णन भी किया। (चौथे स्कन्धमें) आपने उस प्रथम मन्वन्तरका वर्णन किया, जिसके अधिपति स्वायम्भुव मनु थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 695) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/3/