॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.15
केचित्केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणाः।
अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारमिव भास्करः॥ १५
kecitkevalayā bhaktyā vāsudevaparāyaṇāḥ|
aghaṃ dhunvanti kārtsnyena nīhāramiva bhāskaraḥ|| 15
अर्थ
भगवान्की शरणमें रहनेवाले भक्तजन, जो बिरले ही होते हैं, केवल भक्तिके द्वारा अपने सारे पापोंको उसी प्रकार भस्म कर देते हैं, जैसे सूर्य कुहरेको॥ १५॥✎ 493