॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.14
देहवाग्बुद्धिजं धीरा धर्मज्ञाः श्रद्धयान्विताः।
क्षिपन्त्यघं महदपि वेणुगुल्ममिवानलः॥ १४
dehavāgbuddhijaṃ dhīrā dharmajñāḥ śraddhayānvitāḥ|
kṣipantyaghaṃ mahadapi veṇugulmamivānalaḥ|| 14
अर्थ
जैसे बाँसोंके झुरमुटमें लगी आग बाँसोंको जला डालती है—वैसे ही धर्मज्ञ और श्रद्धावान् धीर पुरुष तपस्या, ब्रह्मचर्य, इन्द्रियदमन, मनकी स्थिरता, दान, सत्य, बाहर-भीतरकी पवित्रता तथा यम एवं नियम—इन नौ साधनोंसे मन, वाणी और शरीरद्वारा किये गये बड़े-से-बड़े पापोंको भी नष्ट कर देते हैं॥ १३-१४॥✎ 493