श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥ कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति॥ १२॥ पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥ क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥✎ 937 1053

kuśakusumasamitpalāśaphalamūlodakānyāhariṣyamāṇo vṛkasālāvṛkādibhyo bhayamāśaṃsamāno yadā saha hariṇakuṇakena vanaṃ samāviśati|| 12||

अर्थ

जब उन्हें कुश, पुष्प, समिधा, पत्र और फल-मूलादि लाने होते तो भेड़ियों और कुत्तोंके भयसे उसे वे साथ लेकर ही वनमें जाते॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #937 शब्दोंके बीचका स्थान: ॥११॥ → ॥ ११॥
  • #1053 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आसीत → आसीत्

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