श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवद् उरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत्॥ ४॥ ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं क्रतुभिरुच्चावचैः श्रद्धयाऽऽहृताग्‍निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यपशुसोमानां प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुर्होत्रविधिना ॥ ५॥✎ 1051

sa bahuvinmahīpatiḥ pitṛpitāmahavad uruvatsalatayā sve sve karmaṇi vartamānāḥ prajāḥ svadharmamanuvartamānaḥ paryapālayat|| 4||

अर्थ

महाराज भरत बहुज्ञ थे। वे अपने-अपने कर्मोंमें लगी हुई प्रजाका अपने बाप-दादोंके समान स्वधर्ममें स्थित रहते हुए अत्यन्त वात्सल्यभावसे पालन करने लगे॥ ४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1051 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकृति-विकृतिभिरनुसवनं → प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं

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