॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.7.12
तस्मिन् वाव किल स एकलः पुलहाश्रमोपवन विविधकुसुमकिसलयतुलसिकाम्बुभिः कन्दमूलफलोपहारैश्च समीहमानो भगवत आराधनं विविक्त उपरतविषयाभिलाष उपभृतोपशमः परां निर्वृतिमवाप॥ ११॥ तयेत्थमविरतपुरुषपरिचर्यया भगवति प्रवर्धमानानुरागभरद्रुतहृदयशैथिल्यः प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्भिद्यमानरोमपुलककुलक औत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धावलोकनयन एवं निजरमणारुणचरणारविन्दानुध्यानपरिचितभक्तियोगेन परिप्लुतपरमाह्लादगम्भीरहृदयह्रदावगाढधिषणस्तामपि क्रियमाणां भगवत्सपर्यां न सस्मार॥ १२॥ इत्थं धृतभगवद्व्रतऐणेयाजिनवाससानुसवनाभिषेकार्द्रकपिशकुटिलजटाकलापेन च विरोचमानः सूर्यर्चा भगवन्तं हिरण्मयं पुरुषमुज्जिहाने सूर्यमण्डलेऽभ्युपतिष्ठन्नेतदु होवाच—॥ १३॥✎ 935 936 1052
tayetthamaviratapuruṣaparicaryayā bhagavati pravardhamānānurāgabharadrutahṛdayaśaithilyaḥ praharṣavegenātmanyudbhidyamānaromapulakakulaka autkaṇṭhyapravṛttapraṇayabāṣpaniruddhāvalokanayana evaṃ nijaramaṇāruṇacaraṇāravindānudhyānaparicitabhaktiyogena pariplutaparamāhlādagambhīrahṛdayahradāvagāḍhadhiṣaṇastāmapi kriyamāṇāṃ bhagavatsaparyāṃ na sasmāra|| 12||
अर्थ
इस प्रकार जब वे नियमपूर्वक भगवान्की परिचर्या करने लगे, तब उससे प्रेमका वेग बढ़ता गया—जिससे उनका हृदय द्रवीभूत होकर शान्त हो गया, आनन्दके प्रबल वेगसे शरीरमें रोमांच होने लगा तथा उत्कण्ठाके कारण नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये, जिससे उनकी दृष्टि रुक गयी। अन्तमें जब अपने प्रियतमके अरुण चरणारविन्दोंके ध्यानसे भक्तियोगका आविर्भाव हुआ, तब परमानन्दसे सराबोर हृदयरूप गम्भीर सरोवरमें बुद्धिके डूब जानेसे उन्हें उस नियमपूर्वक की जानेवाली भगवत्पूजाका भी स्मरण न रहा॥ १२॥✎ 443