श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अयमवतारो रजसोपप्लुतकैवल्योपशिक्षणार्थः ॥ १२॥
तस्यानुगुणान् श्लोकान् गायन्ति—

अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या

द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत्।

गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः

कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति॥ १३

tasyānuguṇān ślokān gāyanti—

aho bhuvaḥ saptasamudravatyā

dvīpeṣu varṣeṣvadhipuṇyametat|

gāyanti yatratyajanā murāreḥ

karmāṇi bhadrāṇyavatāravanti|| 13

अर्थ

इसके गुणोंका वर्णन करते हुए लोग इन वाक्योंको कहा करते हैं—‘अहो! सात समुद्रोंवाली पृथ्वीके समस्त द्वीप और वर्षोंमें यह भारतवर्ष बड़ी ही पुण्यभूमि है, क्योंकि यहाँके लोग श्रीहरिके मंगलमय अवतार-चरित्रोंका गान करते हैं॥ १३॥

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