श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य कोङ्कवेङ्ककुटकानां राजार्हन्‍नामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथपाखण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्तयिष्यते॥ ९॥
येन ह वाव कलौ मनुजापसदा देवमायामोहिताः स्वविधिनियोगशौचचारित्रविहीना देवहेलनान्यपव्रतानि निजनिजेच्छया गृह्णाना अस्नानअनाचमन-अशौच-केशोल्लुञ्चनादीनि कलिना अधर्मबहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति॥ १०॥
ते च ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयान्धपरम्परयाऽऽश्‍वस्तास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति॥ ११॥✎ 932 933

te ca hyarvāktanayā nijalokayātrayāndhaparamparayā''śvastāstamasyandhe svayameva prapatiṣyanti|| 11||

अर्थ

वे अपनी इस नवीन अवैदिक स्वेच्छाकृत प्रवृत्तिमें अन्धपरम्परासे विश्वास करके मतवाले रहनेके कारण स्वयं ही घोर नरकमें गिरेंगे॥ ११॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #932 शब्दोंके बीचका स्थान: भविष्यन्ति॥१०॥ → भविष्यन्ति॥ १०॥
  • #933 शब्दोंके बीचका स्थान: मन्द:सम्प्रवर्तयिष्यते॥ → मन्दः सम्प्रवर्तयिष्यते॥

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