श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भगवतर्षभेण परिरक्ष्यमाण एतस्मिन् वर्षे न कश्‍चन पुरुषो वाञ्छत्यविद्यमानमिवात्मनोऽन्यस्मात्कथञ्चन किमपि कर्हिचिदवेक्षते भर्तर्यनुसवनं विजृम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण॥ १८॥ स कदाचिदटमानो भगवानृषभो ब्रह्मावर्तगतो ब्रह्मर्षिप्रवरसभायां प्रजानां निशामयन्तीनामात्मजानवहितात्मनः प्रश्रयप्रणयभरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्‍निति होवाच॥ १९॥

bhagavatarṣabheṇa parirakṣyamāṇa etasmin varṣe na kaścana puruṣo vāñchatyavidyamānamivātmano'nyasmātkathañcana kimapi karhicidavekṣate bhartaryanusavanaṃ vijṛmbhitasnehātiśayamantareṇa|| 18||

अर्थ

भगवान् ऋषभदेवके शासनकालमें इस देशका कोई भी पुरुष अपने लिये किसीसे भी अपने प्रभुके प्रति दिन-दिन बढ़नेवाले अनुरागके सिवा और किसी वस्तुकी कभी इच्छा नहीं करता था। यही नहीं, आकाशकुसुमादि अविद्यमान वस्तुकी भाँति कोई किसीकी वस्तुकी ओर दृष्टिपात भी नहीं करता था॥ १८॥

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