श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यद्यच्छीर्षण्याचरितं तत्तदनुवर्तते लोकः॥ १५॥ यद्यपि स्वविदितं सकलधर्मं५ ब्राह्मं गुह्यं ब्राह्मणैर्दर्शितमार्गेण सामादिभिरुपायैर्जनतामनुशशास॥ १६॥ द्रव्यदेशकालवयःश्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितैः सर्वैरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज॥ १७॥

dravyadeśakālavayaḥśraddhartvigvividhoddeśopacitaiḥ sarvairapi kratubhiryathopadeśaṃ śatakṛtva iyāja|| 17||

अर्थ

उन्होंने शास्त्र और ब्राह्मणोंके उपदेशानुसार भिन्‍न-भिन्‍न देवताओंके उद्देश्यसे द्रव्य, देश, काल, आयु, श्रद्धा और ऋत्विज् आदिसे सुसम्पन्‍न सभी प्रकारके सौ-सौ यज्ञ किये॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—सकलधर्माधर्मं ब्राह्मं।

    (मुद्रित पृष्ठ 592)

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