श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अथ ह तमुत्पत्त्यैवाभिव्यज्यमानभगवल्लक्षणं सा१म्योपशमवैराग्यैश्‍वर्यमहाविभूतिभिरनुदिनमेधमानानुभावं प्रकृतयः प्रजा ब्राह्मणा२ देवताश्चावनितलसमवनायातितरां जगृधुः॥ १॥ तस्य ह वा इत्थं वर्ष्मणा वरीयसा बृहच्छ्लोकेन चौजसा बलेन श्रिया यशसा वीर्यशौर्याभ्यां च पिता ऋषभ इतीदं नाम चकार॥ २॥

atha ha tamutpattyaivābhivyajyamānabhagavallakṣaṇaṃ sāmyopaśamavairāgyaiśvaryamahāvibhūtibhiranudinamedhamānānubhāvaṃ prakṛtayaḥ prajā brāhmaṇā devatāścāvanitalasamavanāyātitarāṃ jagṛdhuḥ|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! नाभिनन्दनके अंग जन्मसे ही भगवान् विष्णुके वज्र-अंकुश आदि चिह्नोंसे युक्त थे; समता, शान्ति, वैराग्य और ऐश्‍वर्य आदि महाविभूतियोंके कारण उनका प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता जाता था। यह देखकर मन्त्री आदि प्रकृतिवर्ग, प्रजा, ब्राह्मण और देवताओंकी यह उत्कट अभिलाषा होने लगी कि ये ही पृथ्वीका शासन करें॥ १॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सौम्योपशम०।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)
  2. २

    प्रा० पा०—ब्राह्मणदेवता०।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)

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