श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति निशामयन्त्या मेरुदेव्याः पतिमभिधायान्तर्दधे भगवान्॥ १९॥ बर्हिषि तस्मिन्‍नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान्दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तनुवावततार॥ २०॥

barhiṣi tasminneva viṣṇudatta bhagavān paramarṣibhiḥ prasādito nābheḥ priyacikīrṣayā tadavarodhāyane merudevyāṃ dharmāndarśayitukāmo vātaraśanānāṃ śramaṇānāmṛṣīṇāmūrdhvamanthināṃ śuklayā tanuvāvatatāra|| 20||

अर्थ

विष्णुदत्त परीक्षित्! उस यज्ञमें महर्षियोंद्वारा इस प्रकार प्रसन्‍न किये जानेपर श्रीभगवान् महाराज नाभिका प्रिय करनेके लिये उनके रनिवासमें महारानी मेरुदेवीके गर्भसे दिगम्बर संन्यासी और ऊर्ध्वरेता मुनियोंका धर्म प्रकट करनेके लिये शुद्धसत्त्वमय विग्रहसे प्रकट हुए॥ २०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे नाभिचरिते
ऋषभावतारो नाम तृतीयोऽध्यायः
॥ ३॥

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