श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः

सत्त्वाद्याः प्रकृतिगुणा यदीक्षयाऽऽसन्।

यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन्

नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म॥ ९

utpattisthitilayahetavo'sya kalpāḥ

sattvādyāḥ prakṛtiguṇā yadīkṣayā''san|

yadrūpaṃ dhruvamakṛtaṃ yadekamātman

nānādhātkathamu ha veda tasya vartma|| 9

अर्थ

जिनकी दृष्टि पड़नेसे ही जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके हेतुभूत सत्त्वादि प्राकृत गुण अपने-अपने कार्यमें समर्थ होते हैं, जिनका स्वरूप ध्रुव (अनन्त) और अकृत (अनादि) है तथा जो अकेले होते हुए ही इस नानात्मक प्रपंचको अपनेमें धारण किये हुए हैं—उन भगवान् संकर्षणके तत्त्वको कोई कैसे जान सकता है॥ ९॥

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