श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मूर्तिं नः पुरुकृपया बभार सत्त्वं

संशुद्धं सदसदिदं विभाति यत्र।

यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या-

मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्यः॥ १०

mūrtiṃ naḥ purukṛpayā babhāra sattvaṃ

saṃśuddhaṃ sadasadidaṃ vibhāti yatra|

yallīlāṃ mṛgapatirādade'navadyā-

mādātuṃ svajanamanāṃsyudāravīryaḥ|| 10

अर्थ

जिनमें यह कार्य-कारणरूप सारा प्रपंच भास रहा है तथा अपने निजजनोंका चित्त आकर्षित करनेके लिये की हुई जिनकी वीरतापूर्ण लीलाको परम पराक्रमी सिंहने आदर्श मानकर अपनाया है, उन उदारवीर्य संकर्षण भगवान्‌ने हमपर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण किया है॥ १०॥✎ 485 486

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्‌को
  • #486 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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