श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.24.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

ततोऽधस्तात्सिद्धचारणविद्याधराणां सदनानि तावन्मात्र एव॥ ४॥ ततोऽधस्ताद्यक्षरक्षःपिशाचप्रेतभूतगणानां विहाराजिरमन्तरिक्षं यावद्वायुः प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते॥ ५॥ ततोऽधस्ताच्छतयोजनान्तर इयं पृथिवी यावद्धंसभासश्येनसुपर्णादयः पतत्त्रिप्रवरा उत्पतन्तीति॥ ६॥ उपवर्णितं भूमेर्यथासंनिवेशावस्थानमवनेरप्यधस्तात् सप्त भूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणायामविस्तारेणोपक्लृप्ता अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति॥ ७॥ एतेषु हि बिलस्वर्गेषु स्वर्गादप्यधिककामभोगैश्‍वर्यानन्दभूतिविभूतिभिः सुसमृद्धभवनोद्यानाक्रीडविहारेषु दैत्यदानवकाद्रवेया नित्यप्रमुदितानुरक्तकलत्रापत्यबन्धुसुहृदनुचरा गृहपतय ईश्‍वरादप्यप्रतिहतकामा मायाविनोदा निवसन्ति॥ ८॥ येषु महाराज मयेन मायाविना विनिर्मिताः पुरो नानामणिप्रवरप्रवेकविरचितविचित्रभवनप्राकारगोपुरसभाचैत्यचत्वरायतनादिभिर्नागासुरमिथुनपारावतशुकसारिकाकीर्णकृत्रिमभूमिभिर्विवरेश्‍वरगृहोत्तमैः समलङ्कृताश्‍चकासति॥ ९॥✎ 1064

eteṣu hi bilasvargeṣu svargādapyadhikakāmabhogaiśvaryānandabhūtivibhūtibhiḥ susamṛddhabhavanodyānākrīḍavihāreṣu daityadānavakādraveyā nityapramuditānuraktakalatrāpatyabandhusuhṛdanucarā gṛhapataya īśvarādapyapratihatakāmā māyāvinodā nivasanti|| 8||

अर्थ

ये भूमिके बिल भी एक प्रकारके स्वर्ग ही हैं। इनमें स्वर्गसे भी अधिक विषयभोग, ऐश्‍वर्य, आनन्द, सन्तान-सुख और धन-सम्पत्ति है। यहाँके वैभवपूर्ण भवन, उद्यान और क्रीडास्थलोंमें दैत्य, दानव और नाग तरह-तरहकी मायामयी क्रीडाएँ करते हुए निवास करते हैं। वे सब गार्हस्थ्यधर्मका पालन करनेवाले हैं। उनके स्त्री, पुत्र, बन्धु, बान्धव और सेवकलोग उनसे बड़ा प्रेम रखते हैं और सदा प्रसन्‍नचित्त रहते हैं। उनके भोगोंमें बाधा डालनेकी इन्द्रादिमें भी सामर्थ्य नहीं है॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1064 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ततोऽधस्ताद्यक्षरक्ष:पिशाचप्रेत-भूतगणानां → ततोऽधस्ताद्यक्षरक्षःपिशाचप्रेतभूतगणानां

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