यह कृष्णपक्षमें क्षीण होती हुई कलाओंसे पितृगणके और शुक्लपक्षमें बढ़ती हुई कलाओंसे देवताओंके दिन-रातका विभाग करता है तथा तीस-तीस मुहूर्तोंमें एक-एक नक्षत्रको पार करता है। अन्नमय और अमृतमय होनेके कारण यही समस्त जीवोंका प्राण और जीवन है॥ ९॥
अथ चापूर्यमाणाभिश्च कलाभिरमराणां क्षीयमाणाभिश्च कलाभिः पितॄणामहोरात्राणि पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यां वितन्वानः सर्वजीवनिवहप्राणो जीवश्चैकमेकं नक्षत्रं त्रिंशता मुहूर्तैर्भुङ्क्ते॥ ९॥
यह कृष्णपक्षमें क्षीण होती हुई कलाओंसे पितृगणके और शुक्लपक्षमें बढ़ती हुई कलाओंसे देवताओंके दिन-रातका विभाग करता है तथा तीस-तीस मुहूर्तोंमें एक-एक नक्षत्रको पार करता है। अन्नमय और अमृतमय होनेके कारण यही समस्त जीवोंका प्राण और जीवन है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.22.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 672) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/22/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1063 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृणामहोरात्राणि → पितॄणामहोरात्राणि