श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.35

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

ततः परस्ताल्लोकालोकनामाचलो लोकालोकयोरन्तराले परित उपक्षिप्तः॥ ३४॥ यावन्मानसोत्तरमेर्वोरन्तरं तावती भूमिः काञ्चन्यन्याऽऽदर्शतलोपमा यस्यां प्रहितः पदार्थो न कथञ्चित्पुनः प्रत्युपलभ्यते तस्मात्सर्वसत्त्वपरिहृताऽऽसीत्॥ ३५॥ लोकालोक इति समाख्या यदनेनाचलेन लोकालोकस्यान्तर्वर्तिनावस्थाप्यते॥ ३६॥ स लोकत्रयान्ते परित ईश्‍वरेण विहितो यस्मात्सूर्यादीनां ध्रुवापवर्गाणां ज्योतिर्गणानां गभस्तयोऽर्वाचीनांस्त्रील्‍ँलोकान् आवितन्वाना न कदाचित्पराचीना भवितुमुत्सहन्ते तावदुन्‍नहनायामः॥ ३७॥

yāvanmānasottaramervorantaraṃ tāvatī bhūmiḥ kāñcanyanyā''darśatalopamā yasyāṃ prahitaḥ padārtho na kathañcitpunaḥ pratyupalabhyate tasmātsarvasattvaparihṛtā''sīt|| 35||

अर्थ

मेरुसे लेकर मानसोत्तर पर्वततक जितना अन्तर है, उतनी ही भूमि शुद्धोदक समुद्रके उस ओर है। उसके आगे सुवर्णमयी भूमि है, जो दर्पणके समान स्वच्छ है। इसमें गिरी हुई कोई वस्तु फिर नहीं मिलती, इसलिये वहाँ देवताओंके अतिरिक्त और कोई प्राणी नहीं रहता॥ ३५॥✎ 1357 1358

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1357 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रवपर्यन्त → धु्रुवपर्यन्त
  • #1358 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रुवपर्यन्त → ध्रुवपर्यन्त

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