श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तथा घृतोदाद्बहिः क्रौञ्चद्वीपो द्विगुणः स्वमानेन क्षीरोदेन परित उपक्लृप्तो वृतो यथा कुशद्वीपो घृतोदेन यस्मिन् क्रौञ्चो नाम पर्वतराजो द्वीपनामनिर्वर्तक आस्ते॥ १८॥ योऽसौ गुहप्रहरणोन्मथितनितम्बकुञ्जोऽपिक्षीरोदेनासिच्यमानो भगवता वरुणेनाभिगुप्तो विभयो बभूव॥ १९॥ तस्मिन्‍नपि प्रैयव्रतो घृतपृष्ठो नामाधिपतिः स्वे४ द्वीपे वर्षाणि सप्त विभज्य तेषु पुत्रनामसु सप्त रिक्थादान् वर्षपान्‍निवेश्य स्वयं भगवान् भगवतः परमकल्याणयशस आत्मभूतस्य हरेश्‍चरणारविन्दमुपजगाम॥ २०॥

yo'sau guhapraharaṇonmathitanitambakuñjo'pikṣīrodenāsicyamāno bhagavatā varuṇenābhigupto vibhayo babhūva|| 19||

अर्थ

पूर्वकालमें श्रीस्वामिकार्तिकेयजीके शस्त्रप्रहारसे इसका कटिप्रदेश और लता-निकुंजादि क्षत-विक्षत हो गये थे, किन्तु क्षीरसमुद्रसे सींचा जाकर और वरुणदेवसे सुरक्षित होकर यह फिर निर्भय हो गया॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—श्वेतद्वीपे।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 664)

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