॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.20.18
तथा घृतोदाद्बहिः क्रौञ्चद्वीपो द्विगुणः स्वमानेन क्षीरोदेन परित उपक्लृप्तो वृतो यथा कुशद्वीपो घृतोदेन यस्मिन् क्रौञ्चो नाम पर्वतराजो द्वीपनामनिर्वर्तक आस्ते॥ १८॥ योऽसौ गुहप्रहरणोन्मथितनितम्बकुञ्जोऽपिक्षीरोदेनासिच्यमानो भगवता वरुणेनाभिगुप्तो विभयो बभूव॥ १९॥ तस्मिन्नपि प्रैयव्रतो घृतपृष्ठो नामाधिपतिः स्वे४ द्वीपे वर्षाणि सप्त विभज्य तेषु पुत्रनामसु सप्त रिक्थादान् वर्षपान्निवेश्य स्वयं भगवान् भगवतः परमकल्याणयशस आत्मभूतस्य हरेश्चरणारविन्दमुपजगाम॥ २०॥
tathā ghṛtodādbahiḥ krauñcadvīpo dviguṇaḥ svamānena kṣīrodena parita upaklṛpto vṛto yathā kuśadvīpo ghṛtodena yasmin krauñco nāma parvatarājo dvīpanāmanirvartaka āste|| 18||
अर्थ
राजन्! फिर घृतसमुद्रसे आगे उससे द्विगुण परिमाणवाला क्रौंचद्वीप है। जिस प्रकार कुशद्वीप घृतसमुद्रसे घिरा हुआ है, उसी प्रकार यह अपने ही समान विस्तारवाले दूधके समुद्रसे घिरा हुआ है। यहाँ क्रौंच नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है, उसीके कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप हुआ है॥ १८॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—श्वेतद्वीपे।