॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.9
भारतेऽपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्यआकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपशमो परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति॥ ९॥
bhārate'pi varṣe bhagavānnaranārāyaṇākhyaākalpāntamupacitadharmajñānavairāgyaiśvaryopaśamo paramātmopalambhanamanugrahāyātmavatāmanukampayā tapo'vyaktagatiścarati|| 9||
अर्थ
भारतवर्षमें भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये अव्यक्तरूपसे कल्पके अन्ततक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरतिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्तमें आत्मस्वरूपकी उपलब्धि हो सकती है॥ ९॥