श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः

सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम्।

भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं

य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति॥ ८

suro'suro vāpyatha vānaro naraḥ

sarvātmanā yaḥ sukṛtajñamuttamam|

bhajeta rāmaṃ manujākṛtiṃ hariṃ

ya uttarānanayatkosalāndivamiti|| 8

अर्थ

देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य—कोई भी हो, उसे सब प्रकारसे श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूपमें साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े कियेको भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधामको सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसलवासियोंको भी अपने साथ ही ले गये थे’॥ ८॥

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