॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.4
यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं
स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम्।
प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं
ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये॥ ४
yattadviśuddhānubhavamātramekaṃ
svatejasā dhvastaguṇavyavastham|
pratyak praśāntaṃ sudhiyopalambhanaṃ
hyanāmarūpaṃ nirahaṃ prapadye|| 4
अर्थ
‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूपके प्रकाशसे गुणोंके कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओंका निरास करनेवाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धिसे ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूपसे रहित और अहंकारशून्य हैं; मैं आपकी शरणमें हूँ॥ ४॥