॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.22
किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै-
र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना।
न यत्र नारायणपादपङ्कज-
स्मृतिः प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात्॥ २२
kiṃ duṣkarairnaḥ kratubhistapovratai-
rdānādibhirvā dyujayena phalgunā|
na yatra nārāyaṇapādapaṅkaja-
smṛtiḥ pramuṣṭātiśayendriyotsavāt|| 22
अर्थ
हमें बड़े कठोर यज्ञ, तप, व्रत और दानादि करके जो यह तुच्छ स्वर्गका अधिकार प्राप्त हुआ है—इससे क्या लाभ है? यहाँ तो इन्द्रियोंके भोगोंकी अधिकताके कारण स्मृतिशक्ति छिन जाती है, अतः कभी श्रीनारायणके चरणकमलोंकी स्मृति होती ही नहीं॥ २२॥