श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एतदेव हि देवा गायन्ति—

अहो अमीषां किमकारि शोभनं

प्रसन्‍न एषां स्विदुत स्वयं हरिः।

यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे १

मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः॥ २१

etadeva hi devā gāyanti—

aho amīṣāṃ kimakāri śobhanaṃ

prasanna eṣāṃ sviduta svayaṃ hariḥ|

yairjanma labdhaṃ nṛṣu bhāratājire

mukundasevaupayikaṃ spṛhā hi naḥ|| 21

अर्थ

देवता भी भारतवर्षमें उत्पन्‍न हुए मनुष्योंकी इस प्रकार महिमा गाते हैं—‘अहा! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्‌की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्‍न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो निरन्तर हम भी तरसते रहते हैं॥ २१॥✎ 464

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तेऽजिरे।

    (मुद्रित पृष्ठ 660)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #464 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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