oṃ namo bhagavate akūpārāya sarvasattvaguṇaviśeṣaṇāyānupalakṣitasthānāya namo varṣmaṇe namo bhūmne namo namo'vasthānāya namaste|| 30||
अर्थ
—‘जो सम्पूर्ण सत्त्वगुणसे युक्त हैं, जलमें विचरते रहनेके कारण जिनके स्थानका कोई निश्चय नहीं है तथा जो कालकी मर्यादाके बाहर हैं, उन ओंकारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान् कच्छपको बार-बार नमस्कार है’॥ ३०॥✎ 4611356
ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्ते॥ ३०॥
—‘जो सम्पूर्ण सत्त्वगुणसे युक्त हैं, जलमें विचरते रहनेके कारण जिनके स्थानका कोई निश्चय नहीं है तथा जो कालकी मर्यादाके बाहर हैं, उन ओंकारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान् कच्छपको बार-बार नमस्कार है’॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 654) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/18/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)