जो लोग इनका मधुपान करते हैं, उनके मुखसे निकली हुई वायु अपने चारों ओर सौ-सौ योजनतक इसकी महक फैला देती है॥ २३॥
या ह्युपयुञ्जानानां मुखनिर्वासितो वायुः समन्ताच्छतयोजनमनुवासयति॥ २३॥
जो लोग इनका मधुपान करते हैं, उनके मुखसे निकली हुई वायु अपने चारों ओर सौ-सौ योजनतक इसकी महक फैला देती है॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.16.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 643) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/16/23/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—मनुमादयन्ति।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
२
प्रा० पा०—यो ह्युप।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
३
प्रा० पा०—मुखनिःश्वसितो।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1887 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुपार्श्वनिरूढे → सुपार्श्वनिरूढो