सुपार्श्व पर्वतपर जो विशाल कदम्बवृक्ष है, उसके पाँच कोटरोंसे मधुकी पाँच धाराएँ निकलती हैं; उनकी मोटाई पाँच पुरसे जितनी है। ये सुपार्श्वके शिखरसे गिरकर इलावृतवर्षके पश्चिमी भागको अपनी सुगन्धसे सुवासित करती हैं॥ २२॥
यस्तु महाकदम्बः सुपार्श्वनिरूढो यास्तस्य कोटरेभ्यो विनिःसृताः पञ्चायामपरिणाहाः पञ्च मधुधाराः सुपार्श्वशिखरात्पतन्त्योऽपरेणात्मानमिलावृतमनुमोदयन्ति॥ २२॥
सुपार्श्व पर्वतपर जो विशाल कदम्बवृक्ष है, उसके पाँच कोटरोंसे मधुकी पाँच धाराएँ निकलती हैं; उनकी मोटाई पाँच पुरसे जितनी है। ये सुपार्श्वके शिखरसे गिरकर इलावृतवर्षके पश्चिमी भागको अपनी सुगन्धसे सुवासित करती हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.16.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 643) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/16/22/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—मनुमादयन्ति।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
२
प्रा० पा०—यो ह्युप।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
३
प्रा० पा०—मुखनिःश्वसितो।
(मुद्रित पृष्ठ 643)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1887 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुपार्श्वनिरूढे → सुपार्श्वनिरूढो