श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

गयं नृपः कः प्रतियाति कर्मभि-

र्यज्वाभिमानी बहुविद्धर्मगोप्ता।

समागतश्रीः सदसस्पतिः सतां

सत्सेवकोऽन्यो भगवत्कलामृते॥ ९

gayaṃ nṛpaḥ kaḥ pratiyāti karmabhi-

ryajvābhimānī bahuviddharmagoptā|

samāgataśrīḥ sadasaspatiḥ satāṃ

satsevako'nyo bhagavatkalāmṛte|| 9

अर्थ

‘अहो! अपने कर्मोंसे महाराज गयकी बराबरी और कौन राजा कर सकता है? वे साक्षात् भगवान्‌की कला ही थे। उन्हें छोड़कर और कौन इस प्रकार यज्ञोंका विधिवत् अनुष्ठान करनेवाला, मनस्वी, बहुज्ञ, धर्मकी रक्षा करनेवाला, लक्ष्मीका प्रियपात्र, साधुसमाजका शिरोमणि और सत्पुरुषोंका सच्चा सेवक हो सकता है?’॥ ९॥✎ 453 454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #453 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,तथा → थे, तथा
  • #454 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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