॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.45
यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय
योगाय सांख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय।
नारायणाय हरये नम इत्युदारं
हास्यन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार॥ ४५
yajñāya dharmapataye vidhinaipuṇāya
yogāya sāṃkhyaśirase prakṛtīśvarāya|
nārāyaṇāya haraye nama ityudāraṃ
hāsyanmṛgatvamapi yaḥ samudājahāra|| 45
अर्थ
उन्होंने मृगशरीर छोड़नेकी इच्छा होनेपर उच्चस्वरसे कहा था कि धर्मकी रक्षा करनेवाले, धर्मानुष्ठानमें निपुण, योगगम्य, सांख्यके प्रतिपाद्य, प्रकृतिके अधीश्वर यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरिको नमस्कार है।’॥ ४५॥