श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.44

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान्

प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्।

नैच्छन्‍नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट्-

सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः॥ ४४

yo dustyajān kṣitisutasvajanārthadārān

prārthyāṃ śriyaṃ suravaraiḥ sadayāvalokām|

naicchannṛpastaducitaṃ mahatāṃ madhudviṭ-

sevānuraktamanasāmabhavo'pi phalguḥ|| 44

अर्थ

उन्होंने अति दुस्त्यज पृथ्वी, पुत्र, स्वजन, सम्पत्ति और स्त्रीकी तथा जिसके लिये बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं किन्तु जो स्वयं उनकी दयादृष्टिके लिये उनपर दृष्टिपात करती रहती थी—उस लक्ष्मीकी भी, लेशमात्र इच्छा नहीं की। यह सब उनके लिये उचित ही था; क्योंकि जिन महानुभावोंका चित्त भगवान् मधुसूदनकी सेवामें अनुरक्त हो गया है, उनकी दृष्टिमें मोक्षपद भी अत्यन्त तुच्छ है॥ ४४॥

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