श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य-

मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्तः ।

गुरोर्हरेश्‍चरणोपासनास्त्रो

जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम्॥ १७

bhrātṛvyamenaṃ tadadabhravīrya-

mupekṣayādhyedhitamapramattaḥ |

gurorhareścaraṇopāsanāstro

jahi vyalīkaṃ svayamātmamoṣam|| 17

अर्थ

यह मन ही तुम्हारा बड़ा बलवान् शत्रु है। तुम्हारे उपेक्षा करनेसे इसकी शक्ति और भी बढ़ गयी है। यह यद्यपि स्वयं तो सर्वथा मिथ्या है, तथापि इसने तुम्हारे आत्मस्वरूपको आच्छादित कर रखा है। इसलिये तुम सावधान होकर श्रीगुरु और हरिके चरणोंकी उपासनाके अस्त्रसे इसे मार डालो॥ १७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ब्राह्मणरहूगणसंवादे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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