श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं

संसारतापावपनं जनस्य।

यच्छोकमोहामयरागलोभ-

वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते॥ १६

na yāvadetanmana ātmaliṅgaṃ

saṃsāratāpāvapanaṃ janasya|

yacchokamohāmayarāgalobha-

vairānubandhaṃ mamatāṃ vidhatte|| 16

अर्थ

राजन्! जबतक मनुष्य ज्ञानोदयके द्वारा इस मायाका तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम-क्रोधादि छः शत्रुओंको जीतकर आत्मतत्त्वको नहीं जान लेता और जबतक वह आत्माके उपाधिरूप मनको संसार-दुःखका क्षेत्र नहीं समझता, तबतक वह इस लोकमें यों ही भटकता रहता है, क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह, रोग, राग, लोभ और वैर आदिके संस्कार तथा ममताकी वृद्धि करता रहता है॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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