श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.24

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

इति ह वाव स जगतीपतिरीश्‍वरेच्छयाधिनिवेशित कर्माधिकारोऽखिलजगद्बन्धध्वंसनपरानुभावस्य भगवत आदिपुरुषस्याङ्‌घ्रियुगलानवरतध्यानानुभावेन परिरन्धितकषायाशयोऽवदातोऽपि मानवर्धनो महतां महीतलमनुशशास॥ २३॥ अथ च दुहितरं प्रजापतेर्विश्‍वकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह वाव आत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूपवीर्योदारान्दश भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम॥ २४॥

atha ca duhitaraṃ prajāpaterviśvakarmaṇa upayeme barhiṣmatīṃ nāma tasyāmu ha vāva ātmajānātmasamānaśīlaguṇakarmarūpavīryodārāndaśa bhāvayāmbabhūva kanyāṃ ca yavīyasīmūrjasvatīṃ nāma|| 24||

अर्थ

तदनन्तर उन्होंने प्रजापति विश्‍वकर्माकी पुत्री बर्हिष्मतीसे विवाह किया। उससे उनके दस पुत्र हुए। वे सब उन्हींके समान शीलवान्, गुणी, कर्मनिष्ठ, रूपवान् और पराक्रमी थे। उनसे छोटी ऊर्जस्वती नामकी एक कन्या भी हुई॥ २४॥

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