श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

इति ह वाव स जगतीपतिरीश्‍वरेच्छयाधिनिवेशित कर्माधिकारोऽखिलजगद्बन्धध्वंसनपरानुभावस्य भगवत आदिपुरुषस्याङ्‌घ्रियुगलानवरतध्यानानुभावेन परिरन्धितकषायाशयोऽवदातोऽपि मानवर्धनो महतां महीतलमनुशशास॥ २३॥ अथ च दुहितरं प्रजापतेर्विश्‍वकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह वाव आत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूपवीर्योदारान्दश भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम॥ २४॥

iti ha vāva sa jagatīpatirīśvarecchayādhiniveśita karmādhikāro'khilajagadbandhadhvaṃsanaparānubhāvasya bhagavata ādipuruṣasyāṅghriyugalānavaratadhyānānubhāvena parirandhitakaṣāyāśayo'vadāto'pi mānavardhano mahatāṃ mahītalamanuśaśāsa|| 23||

अर्थ

अब पृथ्वीपति महाराज प्रियव्रत भगवान्‌की इच्छासे राज्यशासनके कार्यमें नियुक्त हुए। जो सम्पूर्ण जगत‍्को बन्धनसे छुड़ानेमें अत्यन्त समर्थ हैं, उन आदिपुरुष श्रीभगवान्‌के चरणयुगलका निरन्तर ध्यान करते रहनेसे यद्यपि उनके रागादि सभी मल नष्ट हो चुके थे और उनका हृदय भी अत्यन्त शुद्ध था, तथापि बड़ोंका मान रखनेके लिये वे पृथ्वीका शासन करने लगे॥ २३॥✎ 433

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #433 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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