वह श्रेष्ठ भवन महामूल्य मणियोंकी लड़ियोंसे सुसज्जित था। उसमें अपने पिताजीके लाड़-प्यारका सुख भोगते हुए वे उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे स्वर्गमें देवतालोग रहते हैं॥ ६०॥
महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे।
लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत्॥ ६०
वह श्रेष्ठ भवन महामूल्य मणियोंकी लड़ियोंसे सुसज्जित था। उसमें अपने पिताजीके लाड़-प्यारका सुख भोगते हुए वे उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे स्वर्गमें देवतालोग रहते हैं॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 460) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/60/