श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा।

यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम्॥ ५२

abhyarcitastvayā nūnaṃ bhagavān praṇatārtihā|

yadanudhyāyino dhīrā mṛtyuṃ jigyuḥ sudurjayam|| 52

अर्थ

आपने अवश्य ही शरणागतभयभंजन श्रीहरिकी उपासना की है। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं’॥ ५२॥

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