श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अभिव२न्द्य पितुः पादावाशीर्भिश्चाभि३मन्त्रितः।

ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः॥ ४५

abhivandya pituḥ pādāvāśīrbhiścābhimantritaḥ|

nanāma mātarau śīrṣṇā satkṛtaḥ sajjanāgraṇīḥ|| 45

अर्थ

तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल-प्रश्नादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया॥ ४५॥✎ 1962

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—वाद्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 458)
  2. ३

    प्रा० पा०—चानुम०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 458)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी

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